उपराष्ट्रपति का चुनाव मायनेखेज है!

पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जिन परिस्थितियों में त्यागपत्र दिया उसकी सनसनी बराबर बनी हुई है। इसलिए इस बार भाजपा ने संघ की राय के मुताबिक एक पूर्व संघी सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है। वे दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य से आते हैं। दो राज्यों के राज्यपाल रह चुके हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी 9 सितंबर को होने वाले चुनाव में आंकड़ों के मुताबिक उनकी जीत सुनिश्चित है। लेकिन महत्वपूर्ण यह होगा कि उनकी दो वैसाखियां और रुष्ट भाजपा सांसद भाजपा और संघ के आदेश का कितना परिपालन करते हैं। हालांकि यह भी बहुत से आयातित सांसद भलीभांति जान गए हैं कि संघ का दबदबा बढ़ने से उनको ख़तरा बढ़ने वाला है।

दूसरी ओर इंडिया गठबंधन ने भी जिसे अपना उम्मीदवार घोषित किया है वे भी दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश से हैं। वे किसी राजनीतिक गठबंधन से जुड़े हुए नहीं हैं। वर्तमान में रिटायर होने के बाद वकालत ही उनका पेशा है। वे हैं पूर्व न्यायाधीश बी सुदर्शन रेड्डी जी। जो उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी दलों यानि इंडिया गठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार हैं। पूर्व न्यायाधीश बी सुदर्शन रेड्डी गोवा के पहले लोकायुक्त भी रह चुके हैं।

1971 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में वकील के तौर पर अपना कैरियर शुरू करने वाले सुदर्शन रेड्डी आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज रह चुके हैं। इसके अलावा वह गुवाहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जज भी रह चुके हैं, जहां से वह 2011 में रिटायर हुए। सात माह के लगभग वे गोवा के पहले लोकायुक्त रहे हैं। तब वहां मनोहर पर्रिकर की सरकार थी।

कुल मिलाकर वे एक गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं। वकालत और न्याय ही उनका काम रहा है। इसलिए वर्तमान परिवेश में जब झूठ और अन्याय का बोल बाला है तब संसद के उच्च सदन में ऐसे सभापति का होना लाजिमी है जो सदन को निष्पक्ष तरीके से संचालित कर सके।

यदि हमारे दोनों सदनों के सांसद राज्य सभा सदन में एक काबिल न्याय प्रिय सभापति चाहते हैं तो पार्टी लाइन से हटकर उन्हें जिताकर इस आसंदी पर बैठा सकते हैं।

वर्तमान सरकार की हालत डावांडोल है कभी भी गिर सकती है इसलिए ऐसे उम्मीदवार को चुनिए जिसे इस्तीफा देने पर बाध्य ना किया जाए। आज न्यायपालिका से ही अवाम ने बहुत उम्मीद लगा रखी है। एक सुप्रीम कोर्ट का पूर्व जज यहां प्रतिष्ठित होता है तो उच्च सदन की गरिमा बढ़ेगी ही।

यदि देश की ऐसी जटिल परिस्थितियों में कोई संघवादी हावी होता है तो निष्पक्षता की बात बेमानी होगी। यदि कभी राम जेठमलानी या जगदीप धनखड़ की तरह उनकी आत्मा जागी तो उनका हश्र भी ऐसा ही होगा हालांकि संघी चरित्र में ऐसा उदाहरण आज तक नहीं मिला है। मगर फिर भी उम्मीद तो की जा सकती है क्योंकि मानव मन है जो वृद्धावस्था में सच की ओर अग्रसर होने लगता है।

देश में चारों ओर जब वोट चोरी के खिलाफ भारी आक्रोश नज़र आ रहा हो। जनता जब बदलाव के मूड में है तब तो माननीय सांसदों के लिए जो जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उसका ख्याल रखना ही चाहिए। वरना यह स्वयं सिद्ध होगा कि वे भी इसी चोरी से चुन कर आए हैं और चोरों के साथ हैं। यह एक मायनेखेज चुनाव है जो यह सिद्ध करेगा कि आप जनता के प्रति जिम्मेदार हैं या सरकार के मुखिया और संघ के प्रति।

यह सुनहरा अवसर है जनता के प्रति वफ़ादार बनें और सुयोग्य न्याय प्रिय दलगत राजनीति से दूर श्रेष्ठ उम्मीदवार को जिताएं। हो सकता है सत्र के बीच में ही आपको चुनाव मैदान में आना पड़े वरना चार साल बाद तो आना ही है। तब जनता जवाबदेही तो मांगेगी ही। आइए देशहित में सब मिलकर विचार करें। यह कांग्रेस की जीत हार नहीं है यह देश के पूरे विपक्ष और आपकी जीत होगी। देश एक सुयोग्य उपराष्ट्रपति पाकर धन्य हो जाएगा। ये वर्तमान हालात में देश की ज़रूरत है। अपने से ईमानदारी से सवाल करिए और उस पर अमल कीजिए। देश की पुकार सुनें।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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